आज तक ऐसा प्रवचन किसी ने सुनाया
आप सभी प्रिय मित्रों को नमस्ते।।
पुनः आप सभी का इस नए ब्लॉग में हार्दिक स्वागत है | आशा करता हूँ की आपको पिछला ब्लॉग "कोरोना और यज्ञ " से लाभ हुआ होगा , तो आइए आज एक नए विचार पर चिंतन करते हैं।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि संसार परिवर्तनशील है चाहे वह प्रकृति हो अथवा समाज हर जगह परिवर्तन देखने को मिलता है। समाज में रहने वाला व्यक्ति भी स्वयं को बदलना चाहता है, पर यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि वह किस प्रकार का बदलाव चाहता है , उन्नति अथवा अवनति दोनों ही एक प्रकार का बदलाव है। एक बदलाव, व्यक्ति व समाज को विकास , उत्थान की ओर ले जाता है वहीँ दूसरा बदलाव व्यक्ति एवं समाज को विनाश अथवा पतन की ओर ले जाता है। परन्तु दुर्भाग्यवश आज समाज में इन दोनों में भेद समाप्त हो गया है जिस कारण से सिर्फ एक भाग को ही लोगों ने बदलाव समझ लिया है जिसे हम Modernisation के रूप में आज जानते हैं। इससे दो अर्थ लिए जाते हैं - विज्ञान और तर्क। इस आधुनिकीकरण के नाम पर व्यक्ति , समाज और देश भौतिकतावाद की ओर बढ़ता चला जा रहा है , विकास के नाम पर विनाश हो रहा है। हवा लेने लायक नहीं , जल पीने योग्य नहीं ,पूरा पर्यावरण दूषित हो गया है और जिस करण इस दूषित पर्यावरण से उत्पन्न होने वाले अन्न को ग्रहण करने वाले समाज का व्यवहार भी दूषित हो गया है। हर जगह छीना -झपटी , हेरा -फेरी, लूटमार आदि भ्रष्टाचार सुनने व देखने को मिलता है। इन सभी का मुख्य कारण है लोगों ने बदलाव का अर्थ ठीक रूप में समझा नहीं , वे स्वयं के स्वार्थ में इतने मस्त हो गए की निस्वार्थ के उस मूल्य को भूल गए जिससे समाज की उन्नति होती , उस धर्म को भूल बैठे जो की अर्थ और काम का भी मूल है। एक शब्द में कहें तो समाज उस अध्यात्म को भूल बैठा जिसके बिना समाज में शांति स्थापित नहीं हो सकती , उन्नति एवं उत्थान नहीं हो सकता। वास्तव में समाज में विकास तभी संभव है जब आध्यात्मिक और भौतिक जगत में सामजस्य हो।
इस सम्बन्ध में एक रोचक कथा आती है कि एक महात्मा थे बहुत ही बड़े विद्वान् , धर्मात्मा थे। वे प्रायः नगर- नगर जाकर उपदेश किया करते थे। एक बार किसी नगर में जब वह उपदेश करने गए तब वहां उपस्थित लोगों ने उनसे कहा की , महात्मा जी आज आप कुछ नया उपदेश कीजिये। आपकी वही सब आत्मा , परमात्मा की पुरानी बातें सुन के मन ऊब गया है सो आप कुछ नया उपदेश कीजिये जो आज तक किसी ने नहीं किया।
महात्मा जी बोले ठीक है , इतना बोलकर उन्होंने बोलना आरंभ किया कि, मेरी बात ध्यान से सुनना " कभी भी सच मत बोलो हमेशा झूठ बोलो , कोई दो गाली दे तो उसको चार गाली दो , कभी गड्ढे में गिर जाना तो कभी उठना मत वहीँ पड़े रहना " इतना बोलकर महात्मा वहाँ उपस्थित लोगों से बोले की "बताओ जी आज तक ऐसा प्रवचन किसी ने सुनाया " इतना बोलकर महात्मा लोगों को समझाते हुए बोले की भई ! अपनी तो वही पुरानी बातें है की सदा सत्य बोलो , प्रेम से रहो, मीठा व् हितकर वाणी बोलो , इसी में सबका कल्याण है।
अतः हमें भी अपने व्यक्तिगत , सामाजिक जीवन में बदलाव लाना चाहिए परन्तु बदलाव ऐसा हो जिससे सबका कल्याण हो , महर्षि दयानन्द जी ने ठीक ही कहा है कि ---
प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
धन्यवाद

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